विस्तृत परिचय एवं सांस्कृतिक महत्व
"दुनिया का सबसे अनूठा और 75 दिनों तक चलने वाला ऐतिहासिक पर्व। इसमें रावण का वध नहीं किया जाता, बल्कि बस्तर की आराध्य देवी मां दंतेश्वरी और स्थानीय देवी-देवताओं की विधिवत आराधना की जाती है।"
बस्तर दशहरा सामाजिक समरसता और पर्यावरण संरक्षण का सर्वोच्च उदाहरण है। रथ निर्माण के लिए किसी भी प्रकार की लोहे की कील का उपयोग नहीं होता; साल वृक्ष की लकड़ी और महुआ की छाल की रस्सियों से हजारों आदिवासी मिलकर विशाल रथ खींचते हैं। झाड़-फूंक करने वाले, लोहार, बढ़ई, नाविक और पुजारी—हर समाज का कार्य पूर्व-निर्धारित होता है।
प्रमुख विशेषताएं एवं मुख्य आकर्षण
- 75 दिनों का अखंड पारंपारिक जन-उत्सव
- काछनगादी (कांटों के झूले पर कन्या की अनुमति) रस्म
- विशाल दो मंजिला 8 पहियों व 4 पहियों के काष्ठ रथ की परिक्रमा
- मावली परघाव (माता मावली की पालकी का भव्य स्वागत)
- मुरिया दरबार में राजा व प्रजा के बीच समस्याओं का सीधा समाधान
पारंपरिक विधि-विधान, रस्में एवं प्रक्रिया
पाट जात्रा (प्रथम काष्ठ पूजा) से पर्व का शुभारंभ होता है। इसके बाद डेरी गड़ाई, काछनगादी (कांटों पर झूलती बालिका से उत्सव की अनुमति), कलश स्थापना, जोगी बिठाई (सिरासार में 9 दिन का निर्जल मौन तप), फूल रथ परिक्रमा, मावली परघाव, भीतर रैनी, बाहर रैनी (रथ की प्रतीकात्मक चोरी) और अंतिम दिन मुरिया दरबार संपन्न होता है।
ऐतिहासिक एवं पौराणिक पृष्ठभूमि
13वीं शताब्दी में बस्तर के काकतीय नरेश पुरुषोत्तम देव द्वारा जगन्नाथपुरी से "रथपति" की उपाधि मिलने के बाद 1408 ईस्वी में इस पर्व की शुरुआत हुई थी। 600 वर्षों से अधिक समय से बिना रुके यह परंपरा निरंतर चल रही है।
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