विस्तृत परिचय एवं सांस्कृतिक महत्व
"खलिहानों से नया धान घर आने की खुशी में मनाया जाने वाला दान और समरसता का महापर्व। "छेरछेरा, माई कोठी के धान ला हेरते हेरा!" की गूंज से पूरा प्रदेश गुंजायमान रहता है।"
छेरछेरा पर्व का दार्शनिक संदेश है कि उपार्जित धन और अन्न केवल व्यक्ति का नहीं बल्कि समाज का भी है। इस दिन इकट्ठा किए गए धान से सामूहिक भोज और सामाजिक कार्यों का संपादन होता है।
प्रमुख विशेषताएं एवं मुख्य आकर्षण
- अन्न दान का सबसे बड़ा लोक पर्व
- युवाओं व बच्चों की टोलियां घर-घर जाकर धान मांगती हैं
- तारा गीत एवं डंडा नृत्य का सुंदर प्रदर्शन
- दूध-गुड़ का फरा, तिल के लड्डू और खीर
- अहंकार त्यागकर दान देने और लेने की परंपरा
पारंपरिक विधि-विधान, रस्में एवं प्रक्रिया
पौष पूर्णिमा की सुबह लोग नदी-तालाबों में स्नान कर मां अन्नपूर्णा और शाकंभरी माता की आराधना करते हैं। इसके बाद डफली, झांझ बजाते हुए बच्चे और युवा टोलियां बनाकर घर-घर जाते हैं और छेरछेरा मांगते हैं। गृहणियां सूप भरकर नया धान या अन्न दान करती हैं।
ऐतिहासिक एवं पौराणिक पृष्ठभूमि
कलचुरी राजा कल्याण साय 8 वर्ष तक मुगल दरबार में रहने के बाद जब अपनी राजधानी रतनपुर लौटे, तो प्रजा ने उनका भव्य स्वागत किया। राजा ने रानी फूलकुंवर के साथ मिलकर प्रजा में खजाने और अन्न के भंडार खोल दिए थे। तभी से छेरछेरा दान पर्व मनाया जाता है।
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33 जिला दर्शन
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