विस्तृत परिचय एवं सांस्कृतिक महत्व
"दण्डामी माड़िया आदिवासियों का विश्वप्रसिद्ध वीर नृत्य। पुरुष सिर पर गौर (जंगली भैंसा) के सींगों और कौड़ियों का भारी मुकुट धारण कर विशाल ढोल बजाते हैं।"
यह नृत्य प्रकृति, वन्यजीवों और शिकार कौशल के प्रति आदिवासी समाज की गहरी कृतज्ञता को दर्शाता है। इसे भारत के गणतंत्र दिवस परेड में भी कई बार प्रथम पुरस्कार मिल चुका है।
प्रमुख विशेषताएं एवं मुख्य आकर्षण
- जंगली भैंसे के सींगों व कौड़ियों का अलंकृत मुकुट
- पुरुषों के गले में 3-4 फीट लंबा विशाल ढोल
- महिलाएं लोहे की छड़ (टिडिंग) से जमीन पर ताल देती हैं
- प्रसिद्ध मानवविज्ञानी वेरियर एल्विन द्वारा सर्वोच्च प्रशंसा
पारंपरिक विधि-विधान, रस्में एवं प्रक्रिया
पुरुष गौर पशु के शिकार और उसकी शक्ति का अनुकरण करते हैं। महिलाएं एक-दूसरे का हाथ पकड़कर अर्धवृत्त में लयबद्ध कदमों से चलती हैं और बांसुरी व ढोल की थाप पर कदम मिलाती हैं।
ऐतिहासिक एवं पौराणिक पृष्ठभूमि
गौर (बाइसन) बस्तर के जंगलों का सबसे शक्तिशाली प्राणी माना जाता था। उसकी वीरता और सौंदर्य का सम्मान करने के लिए यह नृत्य रचा गया।
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