विस्तृत परिचय एवं सांस्कृतिक महत्व
"भगवान शिव (गौरा) और माता पार्वती (गौरी) के अलौकिक विवाह प्रसंग पर आधारित अत्यंत पवित्र लोक अनुष्ठान। मिट्टी के गौरा-गौरी बनाकर पूरी रात जागरण, सुआ गीत और सुबह विसर्जन होता है।"
सोंटा प्रहार की मान्यता है कि इससे वर्षभर किसी भी प्रकार की बीमारी, अनिष्ट या नकारात्मक ऊर्जा का प्रवेश शरीर में नहीं होता। गौरा-गौरी के विवाह में पूरा गांव एक परिवार बन जाता है।
प्रमुख विशेषताएं एवं मुख्य आकर्षण
- माटी कोड़ना (मिट्टी खुदाई) व गौरा-गौरी निर्माण
- रातभर मंगल विवाह गीत व ढोल-नगाड़ों की थाप
- कुश के सोंटा (चाबुक) प्रहार से कष्ट निवारण परंपरा
- नदी/तालाब में भावभीना विसर्जन जुलूस
पारंपरिक विधि-विधान, रस्में एवं प्रक्रिया
दीपावली से एक दिन पूर्व महिलाएं तालाब से मिट्टी लाकर गौरा-गौरी की सुंदर प्रतिमाएं बनाती हैं। दीपावली की रात ईसर गौरा की बारात निकलती है, विवाह की रस्में संपन्न होती हैं। सुबह विसर्जन के समय बैगा द्वारा कुश के सोंटे से लोगों की कलाई पर प्रहार किया जाता है।
ऐतिहासिक एवं पौराणिक पृष्ठभूमि
यह अनुष्ठान गोंडवाना संस्कृति का प्राचीनतम हिस्सा है, जिसमें प्रकृति के दो प्रमुख तत्वों—पुरुष (शिव) और प्रकृति (पार्वती) के मिलन का उत्सव मनाया जाता है।
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33 जिला दर्शन
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