विस्तृत परिचय एवं सांस्कृतिक महत्व
"बैगा, गोंड, उरांव, कंवर व बिंझवार जनजातियों का सर्वाधिक लोकप्रिय सामूहिक नृत्य। करम वृक्ष की डाल की पूजा कर "कर्म ही जीवन है" का अमर संदेश दिया जाता है।"
करमा नृत्य छत्तीसगढ़ की सीमाओं को पार कर मध्य प्रदेश, झारखंड और ओडिशा तक फैला है। यह नृत्य जीवन में आलस्य त्यागकर कर्मठ बनने की प्रेरणा देता है।
प्रमुख विशेषताएं एवं मुख्य आकर्षण
- मांदर व टिमकी की तीव्र लयबद्ध व सम्मोहक थाप
- महिलाएं व पुरुष आमने-सामने अर्धवृत्त बनाकर नृत्य
- करमा लहकी, करमा छहा और करमा झरनी शैलियां
- प्रकृति, प्रेम, श्रम और उल्लास का अद्भुत समन्वय
पारंपरिक विधि-विधान, रस्में एवं प्रक्रिया
करम डाल को जंगल से आदरपूर्वक लाकर गांव के चौराहे पर रोपा जाता है। रातभर युवक-युवतियां मांदर की थाप पर झुककर, कदम मिलाकर लयबद्ध नृत्य करते हैं और सुबह नदी में विसर्जन करते हैं।
ऐतिहासिक एवं पौराणिक पृष्ठभूमि
करम सैनी देवी की कृपा से विपत्तियों के नाश और समृद्धि की प्राप्ति की लोककथा इस नृत्य की मूल प्रेरणा है।
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33 जिला दर्शन
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