विस्तृत परिचय एवं सांस्कृतिक महत्व
"आदिवासी अंचलों में माटी देव (धरती माता) के प्रति सम्मान व्यक्त करने का विशिष्ट पर्व। नए महुआ, फल और अन्न ग्रहण करने से पहले माटी देव को अर्पित किए जाते हैं।"
माटी तिहार के बाद ही महुआ, आम, तेंदू और नए कंदमूल का उपभोग शुरू किया जाता है। शाम को पूरे गांव में सामूहिक भोज और मांदरी नृत्य का आयोजन होता है।
प्रमुख विशेषताएं एवं मुख्य आकर्षण
- धरती मां को प्रथम मौसमी फल व अन्न अर्पण
- सामूहिक शिकार (पारध) की पारंपरिक रस्म
- भूमि को विश्राम—हल व कुदाल चलाना सख्त वर्जित
- मांदरी बाजा व लोक नृत्य का सामूहिक उल्लास
पारंपरिक विधि-विधान, रस्में एवं प्रक्रिया
गांव के गायता या सिरहा (पुजारी) द्वारा माटी थान पर पूजा की जाती है। इस दिन हल चलाना, कुदाल चलाना या धरती खोदना सख्त वर्जित होता है ताकि धरती माता को विश्राम मिल सके। इसके बाद युवक जंगल में सामूहिक पारध (शिकार) के लिए जाते हैं।
ऐतिहासिक एवं पौराणिक पृष्ठभूमि
हजारों वर्षों से आदिवासी समाज प्रकृति को अपनी माता मानता आया है। माटी तिहार इसी कृतज्ञता और सह-अस्तित्व की जीवन शैली का साक्षात प्रमाण है।
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