विस्तृत परिचय एवं सांस्कृतिक महत्व
"महाभारत की कथाओं को छत्तीसगढ़ी बोली में अत्यंत ओजस्वी, नाटकीय और संगीतमय शैली में प्रस्तुत करने की विश्वविख्यात लोक कला। तंबूरा और करताल का अद्वितीय प्रयोग।"
पद्म विभूषण डॉ. तीजन बाई, झाडूराम देवांगन, रितु वर्मा और शांति बाई चेलक ने पंडवानी को लंदन, पेरिस, न्यूयॉर्क और टोक्यो के प्रतिष्ठित मंचों तक पहुंचाया है।
प्रमुख विशेषताएं एवं मुख्य आकर्षण
- कापालिक शैली (खड़े होकर अभिनय युक्त - पद्म विभूषण डॉ. तीजन बाई)
- वेदमती शैली (बैठकर शास्त्रसम्मत - झाडूराम देवांगन, पुनाराम निषाद)
- तंबूरे को गदा, धनुष, रथ और तलवार बनाने का अद्भुत अभिनय
- दुनिया के 50+ देशों में भारत की पहचान
पारंपरिक विधि-विधान, रस्में एवं प्रक्रिया
गायक एक हाथ में तंबूरा और दूसरे हाथ में करताल लेकर मंच पर विचरण करता है। रागी (सह-गायक) हुंकारा भरता है और ढोलक वादक कथा के तनाव को चरम पर ले जाता है।
ऐतिहासिक एवं पौराणिक पृष्ठभूमि
पांडवों के चरित्र, विशेषकर महाबली भीम और द्रौपदी के शौर्य को छत्तीसगढ़ के लोकमानस ने अपनी बोली में ढालकर शताब्दियों पूर्व यह शैली विकसित की।
अन्य संबंधित लोक धरोहर
33 जिला दर्शन
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