विस्तृत परिचय एवं सांस्कृतिक महत्व
"खेती-किसानी में दिन-रात पसीना बहाने वाले बैलों और नंदी भगवान के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करने का पावन पर्व। मिट्टी के नंदिया-बैल की पूजा और बालिकाओं द्वारा पोरा-चुकिया खेलने का आनंद।"
पोला पर्व छत्तीसगढ़ी नारी और बच्चों के लिए भी विशेष उल्लास लाता है। छोटी बेटियां मिट्टी के बर्तनों (पोरा-चुकिया) से खेलती हैं, जिससे उन्हें रसोई और गृहस्थी के संस्कारों का स्वाभाविक ज्ञान प्राप्त होता है।
प्रमुख विशेषताएं एवं मुख्य आकर्षण
- सजे-धजे बैलों से इस दिन कोई कार्य नहीं कराया जाता
- कुम्हार द्वारा निर्मित मिट्टी के बैलों की घर-घर पूजा
- बालिकाओं द्वारा पोरा, चुकिया, जांता से गृहस्थी के खेल
- ठेठरी एवं खुरमी का विशेष पारंपरिक नैवेद्य
- बैलों की दौड़ और श्रृंगार प्रतियोगिताएं
पारंपरिक विधि-विधान, रस्में एवं प्रक्रिया
दिन में बैलों को महुआ तेल व हल्दी से नहलाया जाता है। उनके सींगों को चमकीले रंगों से रंगा जाता है और गले में घुंघरू-पट्टे बांधे जाते हैं। शाम को घर के आंगन में मिट्टी के बैलों को पाट पर रखकर खुरमी, ठेठरी, अइरसा और गुझिया का भोग लगाया जाता है।
ऐतिहासिक एवं पौराणिक पृष्ठभूमि
पौराणिक मान्यता के अनुसार, भगवान श्रीकृष्ण के बाल्यकाल में कंस द्वारा भेजे गए पोलासुर नामक दैत्य का वध इसी दिन हुआ था, जिसके उपलक्ष्य में यह उत्सव मनाया जाता है।
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33 जिला दर्शन
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