विस्तृत परिचय एवं सांस्कृतिक महत्व
"महिलाओं और कन्याओं का कोमल व मर्मस्पर्शी लोक नृत्य। धान से भरी टोकरी में मिट्टी का सुआ (तोता) रखकर वृत्ताकार घेरे में ताली की थाप पर शिव-पार्वती के गीत गाए जाते हैं।"
सुआ नृत्य में किसी भी वाद्ययंत्र की जरूरत नहीं होती; केवल हाथों की तालियां और पैरों की थिरकन ही संगीत उत्पन्न करती हैं। यह नारी मन की सरल अभिव्यक्ति है।
प्रमुख विशेषताएं एवं मुख्य आकर्षण
- बिना किसी वाद्ययंत्र के सिर्फ तालियों की थाप पर नृत्य
- मिट्टी का तोता भगवान तक संदेश पहुंचाने का माध्यम
- विरह, भक्ति, दांपत्य और पारिवारिक संवेदनाएं
- पारंपरिक लाल-पीली साड़ियां और आभूषण
पारंपरिक विधि-विधान, रस्में एवं प्रक्रिया
घर-घर जाकर महिलाएं आंगन में टोकरी रखकर चारों ओर झुक-झुक कर गोल-गोल घूमते हुए ताली बजाती हैं और "तरि हरी नाना, मोरे ना ना..." के बोल पर सुआ गीत गाती हैं।
ऐतिहासिक एवं पौराणिक पृष्ठभूमि
तोता (सुआ) को प्राचीन काल से संदेशवाहक माना जाता है। महिलाएं अपने मन की बात, वियोग और प्रार्थनाएं तोते के माध्यम से भगवान तक पहुंचाती हैं।
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33 जिला दर्शन
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