विस्तृत परिचय एवं सांस्कृतिक महत्व
"छत्तीसगढ़ की विवाहित बेटियों का सबसे बड़ा आत्मिक और भावुक पर्व। बहन-बेटियों को ससुराल से मायके लाने भाई जाते हैं। महिलाएं अखंड सौभाग्य व पति की दीर्घायु हेतु 24 घंटे का कठोर निर्जला व्रत रखती हैं।"
तीजा केवल व्रत नहीं बल्कि छत्तीसगढ़ी समाज में बेटियों के प्रति अगाध प्रेम का प्रतीक है। ससुराल की तमाम जिम्मेदारियों से मुक्त होकर महिलाएं मायके में बेटी बनकर बचपन की सहेलियों के साथ आनंद से झूला झूलती हैं।
प्रमुख विशेषताएं एवं मुख्य आकर्षण
- करू भात (तीजा पूर्व रात्रि का कड़वा भोजन)
- 24 घंटे का अखंड निर्जला उपवास
- बालू-रेत के शिवलिंग व गौरी-गणेश का निर्माण व पूजन
- मायके में सखियों संग रात्रि जागरण, भजन व झूला झूलना
- तीजा गीत एवं पारंपरिक 16 श्रृंगार
पारंपरिक विधि-विधान, रस्में एवं प्रक्रिया
तृतीया के पूर्व दिन रात में करेले की सब्जी और भात (करू भात) खाया जाता है। तृतीया को सुबह से निर्जल व्रत शुरू होता है। शाम को नदी या तालाब की बालू से शिव-पार्वती की प्रतिमा बनाकर फूल, बेलपत्र, धतूरा और मदार से पूजा की जाती है। रातभर महिलाएं जागकर भजन-कीर्तन करती हैं और चतुर्थी को विसर्जन के बाद फलाहार कर पारण करती हैं।
ऐतिहासिक एवं पौराणिक पृष्ठभूमि
माता पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए जंगल में सखियों के साथ कठोर तपस्या और निर्जला व्रत रखा था। हरितालिका का अर्थ है सखियों द्वारा हरण करके तपस्या स्थल तक ले जाना।
अन्य संबंधित लोक धरोहर
33 जिला दर्शन
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