छत्तीसगढ़ संतों, साहित्यकारों, रंगकर्मियों और लोक कलाकारों की पावन धरा है। गुरु घासीदास जी का "मनखे-मनखे एक समान", महाप्रभु वल्लभाचार्य का पुष्टिमार्ग और तीजन बाई की पंडवानी ने छत्तीसगढ़ को वैश्विक पहचान दिलाई है।
जन्म: गिरौदपुरी। "मनखे-मनखे एक समान" (सभी मानव एक समान हैं) का अमर संदेश दिया। जाति-पाति, मूर्तिपूजा व बलि प्रथा का विरोध कर सत्य की स्थापना की।
जन्म: चंपारण्य (रायपुर)। वैष्णव भक्ति आंदोलन के महान आचार्य, कृष्ण भक्ति और पुष्टि संप्रदाय के जनक।
असम के नगांव में जन्मी, गुरु अगमदास जी की धर्मपत्नी। अस्पृश्यता निवारण कानून 1955 को संसद में पारित कराने में ऐतिहासिक योगदान।
1900 में पेंड्रा से "छत्तीसगढ़ मित्र" नामक मासिक पत्रिका का संपादन प्रारंभ किया। "एक टोकरी भर मिट्टी" हिंदी की पहली मौलिक कहानी मानी जाती है।
नाटक "करम छड़हा" और "ऊंच-नीच" लिखकर सामाजिक कुरीतियों पर प्रहार किया। 1956 में "छत्तीसगढ़ महासभा" का गठन किया।
भिलाई की निवासी। महाभारत की कथाओं को तंबूरे के साथ सजीव अभिनय द्वारा प्रस्तुत कर छत्तीसगढ़ी संस्कृति को 50+ देशों में गुंजायमान किया।
प्रागैतिहासिक काल, राम वन गमन पथ, सिरपुर का स्वर्णकाल, कलचुरी 800 वर्ष, बस्तर के 8 जनजातीय विद्रोह, 1857 क्रांति व राज्य निर्माण आंदोलन।
संपूर्ण इतिहास देखें (क्लिक करें)