छत्तीसगढ़ की कुल आबादी का 30.62% जनजातीय समुदाय है। यहां 42 प्रकार की जनजातियां निवास करती हैं। बस्तर को "जनजातियों की भूमि" कहा जाता है जहां युवागृह घोटुल, गौर नृत्य, ककसार और 75 दिवसीय बस्तर दशहरा विश्व प्रसिद्ध हैं।
सर्वाधिक जनसंख्या वाला समूह। स्वयं को "कोइतूर" कहते हैं। मड़ई मेला व मेघनाद पर्व प्रमुख।
गोंडों के पुरोहित व जंगलों के परंपरागत वैद्य। मुख्य नृत्य: करमा, बिलमा, सैला। "द बैगा" पुस्तक वेरियर एल्विन ने लिखी।
सबसे एकांतप्रिय व आदिम जनजाति। काष्ठ शिल्प व ककसार नृत्य। पेय पदार्थ: सल्फी व पेज।
बांस शिल्प कला में निपुण, घोड़ा छूना वर्जित मानते हैं।
तीर-धनुष चलाने में पारंगत, दमनच नृत्य (भयावह विवाह नृत्य) करते हैं।
सर्वाधिक साक्षर जनजाति। युवागृह "धूमकुरिया"। मुख्य नृत्य व पर्व: "सरहुल" (साल वृक्ष फूल खिलने पर)।
गुरु घासीदास जी के सत्य व अहिंसा संदेशों पर आधारित आध्यात्मिक नृत्य। स्वर्गीय देवदास बंजारे अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त नर्तक थे।
दीपावली के अवसर पर टोकरी में मिट्टी का तोता (सुआ) रखकर शिव-पार्वती (गौरा-गौरी) प्रसंगों पर गाया जाने वाला विरह नृत्य।
भादों एकादशी को कर्म देवता की आराधना में स्त्री-पुरुषों द्वारा सामूहिक रूप से किया जाने वाला उल्लासपूर्ण नृत्य।
दीपावली के बाद देवउठनी एकादशी तक लाठी संचालन और दोहों की तान पर पौरुष प्रदर्शन वाला शौर्य नृत्य (छ.ग. का गरबा/रास)।
सिर पर जंगली भैंसे (बायसन) के सींग और कौड़ियों का मुकुट पहनकर किया जाने वाला शिकार नृत्य। वेरियर एल्विन ने इसे विश्व का सबसे सुंदर नृत्य कहा।
प्रागैतिहासिक काल, राम वन गमन पथ, सिरपुर का स्वर्णकाल, कलचुरी 800 वर्ष, बस्तर के 8 जनजातीय विद्रोह, 1857 क्रांति व राज्य निर्माण आंदोलन।
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