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36 गढ़ों का संगठन • 1000 ई. से 1741 ई.

कलचुरी राजवंश (रतनपुर एवं रायपुर शाखा - 800+ वर्षों का शासन)

कलिंगराज ने 1000 ई. में तुम्माण को राजधानी बनाकर कलचुरी शासन की स्थापना की। 1050 ई. में रत्नदेव प्रथम ने रतनपुर नगर बसाकर इसे राजधानी बनाया। कलचुरियों ने इस अंचल पर 840 वर्षों तक अखंड शासन किया और 36 गढ़ों की अमर व्यवस्था दी।

ऐतिहासिक कालखंड

8 अध्याय
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1000 ई. से 1741 ई.

कलचुरी राजवंश (रतनपुर एवं रायपुर शाखा - 800+ वर्षों का शासन)

Kalchuri Dynasty - Ratanpur & Raipur 36 Garh System

प्रमुख ऐतिहासिक घटनाएं एवं संदर्भ

संस्थापक: कलिंगराज (1000 ई.) - राजधानी तुम्माण (कोरबा)। महिषासुर मर्दिनी मंदिर बनवाया।
कमलराज: त्रिपुरी के गांगेयदेव के उत्कल अभियान में सहायता की।
रत्नदेव प्रथम (1050 ई.): रतनपुर (रत्नपुर) नगर की स्थापना की, महामाया मंदिर एवं महिषासुरमर्दिनी मंदिर का निर्माण कराया।
पृथ्वीदेव प्रथम: "सकलकोसलाधिपति" एवं "प्रचंडकोसलाधिपति" की उपाधि धारण की। चित्तौड़गढ़ (लाफागढ़) का किला बनवाया।
जाजल्लदेव प्रथम: कलचुरियों के सबसे शक्तिशाली स्वतंत्र शासक। "श्रीमत जाजल्लदेव" नाम से स्वर्ण व तांबे के सिक्के जारी किए। जांजगीर का नकटू विष्णु मंदिर बनवाया।
रत्नदेव द्वितीय: त्रिपुरी कलचुरियों और ओडिशा के गंगवंशी शासक अनंतवर्मन चोडगंग को युद्ध में हराया।
कलचुरी विभाजन (लहुरी शाखा): 14वीं सदी में केशवदेव और रामचंद्र देव ने रायपुर शाखा की नींव रखी। ब्रह्मदेव राय (1409 ई.) ने रायपुर को स्थायी राजधानी बनाया।
36 गढ़ प्रशासनिक व्यवस्था: शिवनाथ नदी सीमा बनी। उत्तर में रतनपुर राज्य के 18 गढ़ और दक्षिण में रायपुर राज्य के 18 गढ़। प्रत्येक गढ़ में 84 गांव (चौरासी) और बरहों में 12-12 गांव होते थे।

प्रमुख ऐतिहासिक स्थल एवं पुरातात्विक साक्ष्य

महामाया मंदिर, रतनपुर

बिलासपुर

1050 ई. में राजा रत्नदेव प्रथम द्वारा निर्मित 51 शक्तिपीठों में से एक पवित्र धाम

लाफागढ़ का किला (चित्तौड़गढ़)

कोरबा

पृथ्वीदेव प्रथम द्वारा निर्मित अभेद्य पहाड़ी दुर्ग व मेनका दरवाजा

विष्णु मंदिर, जांजगीर

जांजगीर-चांपा

1120 ई. में जाजल्लदेव प्रथम द्वारा निर्मित शिखर विहीन उत्कृष्ट स्थापत्य कला मंदिर

दूधाधारी मठ, रायपुर

रायपुर

कलचुरी राजा जैतसिंह के काल में स्वामी बलभद्र दास द्वारा स्थापित ऐतिहासिक वैष्णव पीठ

CGPSC / Vyapam परीक्षा उपयोगी स्मरणीय तथ्य

  • रतनपुर के अंतिम स्वतंत्र कलचुरी शासक रघुनाथ सिंह थे, जिन्हें 1741 ई. में मराठा सेनापति भास्कर पंत ने पराजित किया।
  • रायपुर शाखा के अंतिम शासक अमरसिंह देव थे (1750 ई.)।
  • कलचुरियों के राजकवि गोपाल मिश्र ने "खूब तमाशा" और "सुदामा चरित" की रचना की। बाबू रेवाराम ने "तवारीख-ए-हैहयवंशी" लिखी।

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