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छत्तीसगढ़ की आदिवासी कला एवं शिल्प: कोठी, बांसकर्म और बेलमेटल की समृद्ध यात्रा

Publish: 27 November 2025, 3:50 am IST | Views: Page View 88

परिचय
छत्तीसगढ़, जिसे "भारत का धान का कटोरा" कहा जाता है, अपनी प्राकृतिक सुंदरता और खनिज संपदा के साथ-साथ अपनी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत के लिए भी जाना जाता है। यहां के आदिवासी समुदायों ने सदियों से कला और शिल्प की ऐसी परंपराएं विकसित की हैं जो न केवल सौंदर्यबोध को दर्शाती हैं बल्कि उनके जीवन, विश्वासों और प्रकृति के साथ तालमेल को भी प्रतिबिंबित करती हैं। यह लेख छत्तीसगढ़ की प्रमुख आदिवासी कलाओं और शिल्पों की यात्रा पर ले जाएगा - उनके ऐतिहासिक महत्व से लेकर आधुनिक बाजार में उनकी प्रासंगिकता तक।

कोठी कढ़ाई: कपड़ों पर कहानी कहने की कला
कोठी कढ़ाई छत्तीसगढ़ की सबसे विशिष्ट कलाओं में से एक है, जो मुख्य रूप से राज्य के कोरबा और जशपुर क्षेत्र की आदिवासी महिलाओं द्वारा की जाती है। यह कला कपड़ों पर ज्यामितीय डिजाइनों और प्रकृति से प्रेरित पैटर्नों की कढ़ाई है।

बांस शिल्प: प्रकृति का जादू
छत्तीसगढ़ के वनांचलों में बांस प्रचुर मात्रा में पाया जाता है, और स्थानीय कारीगरों ने इससे शिल्प बनाने की कला में महारत हासिल की है। बस्तर और रायगढ़ क्षेत्र विशेष रूप से अपने बांस शिल्प के लिए प्रसिद्ध हैं।

बेल मेटल क्राफ्ट (धातु शिल्प)
बेल मेटल या कांसा का काम छत्तीसगढ़ की एक और प्रसिद्ध कला है, जो मुख्य रूप से बस्तर क्षेत्र में केंद्रित है। इस धातु के शिल्प अपनी मजबूती और जटिल डिजाइनों के लिए जाने जाते हैं।

लौह शिल्प (आयरन क्राफ्ट)
डूर्ग और बस्तर जिले लौह शिल्प के लिए प्रसिद्ध हैं। स्थानीिक लोहार समुदायों द्वारा हाथ से लोहे को ढालकर बनाई गई मूर्तियां और उपयोगी वस्तुएं अपनी अनूठी कलात्मकता के लिए जानी जाती हैं।

टेराकोटा (मृणशिल्प)
छत्तीसगढ़ के ग्रामीण इलाकों में मिट्टी के बर्तनों और मूर्तियों का निर्माण एक पारंपरिक कला रहा है।

कला के संरक्षण और संवर्धन के प्रयास
सरकारी और गैर-सरकारी संगठन छत्तीसगढ़ की इन पारंपरिक कलाओं के संरक्षण और संवर्धन के लिए काम कर रहे हैं।

चुनौतियां और भविष्य की राह
इन कलाओं के सामने मशीनीकरण, बाजार की पहुंच की कमी, और युवाओं का रुख न करना जैसी चुनौतियां हैं। इनका समाधान बेहतर बाजार संपर्क, डिजाइन में नवाचार, और उपभोक्ता जागरूकता बढ़ाने से संभव है।

निष्कर्ष
छत्तीसगढ़ की आदिवासी कला और शिल्प न केवल राज्य की सांस्कृतिक पहचान हैं बल्कि उसके सामाजिक-आर्थिक ताने-बाने का भी अहम हिस्सा हैं। इन कलाओं को संरक्षित करना और कारीगरों को समर्थन देना न केवल विरासत को बचाने बल्कि टिकाऊ विकास को बढ़ावा देने के समान है। एक जिम्मेदार उपभोक्ता के रूप में इन उत्पादों को खरीदकर हम इन अनमोल कलाओं और उनके रचनाकारों के भविष्य को संवार सकते हैं।


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Categories: Chhattisgarh