छत्तीसगढ़: विकास के अंतर्विरोध और वंचितों के अधिकार का संघर्ष
Publish: 27 November 2025, 4:39 am IST | Views: 69
छत्तीसगढ़, जिसे 'धान का कटोरा' और खनिज संपदा का 'अजस्र भंडार' कहा जाता है, एक गहन विरोधाभास को समेटे हुए है। एक ओर यह प्रकृति की अद्भुत देन से समृद्ध है, तो दूसरी ओर यहाँ के मूल निवासी गहन संकटों से जूझ रहे हैं। एक बड़े वर्ग पर हो रहे अत्याचार और व्यवस्थित अन्याय के आरोप इस संपन्न राज्य की छवि पर एक गहरा धब्बा हैं। ये समस्याएँ अंतर्संबंधित और बहुआयामी हैं, जिनकी जड़ें आर्थिक लालच, सामाजिक विषमता और राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी में हैं।
1. संसाधनों पर अधिकार और विस्थापन का गहराता संकट
सबसे बड़ा संकट स्थानीय लोगों, विशेषकर आदिवासियों, की ज़मीन और संसाधनों पर उनके अधिकार को लेकर है।
- जबरन जमीन अधिग्रहण: बड़े पैमाने पर खनन परियोजनाओं, उद्योगों और बांधों के लिए आदिवासियों एवं स्थानीय किसानों की ज़मीन का सरकार द्वारा जबरन अधिग्रहण किया जा रहा है। 'विकास' के नाम पर चल रही इस प्रक्रिया में उनकी सहमति या भागीदारी नगण्य है।
- अपर्याप्त पुनर्वास एवं मुआवजा: विस्थापितों को न तो पर्याप्त मुआवजा दिया जाता है और न ही उनके पुनर्वास का उचित प्रबंधन होता है। इसके परिणामस्वरूप उनकी आजीविका छिन जाती है और सदियों पुरानी उनकी सामाजिक-सांस्कृतिक पहचान संकट में पड़ जाती है।
- जल-जंगल-जमीन पर अधिकारों का हनन: आदिवासी समुदायों का पारंपरिक रूप से जल, जंगल और ज़मीन पर जो अधिकार रहा है, उसे औद्योगिक और cooperate हितों के आगे नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है। वन अधिकार अधिनियम जैसे कानूनों का क्रियान्वयन अत्यंत धीमा और अवरुद्ध है।
2. नक्सलवाद का दंश: दोनों ओर से मार
छत्तीसगढ़ नक्सलवाद से सर्वाधिक प्रभावित राज्य है, और इस हिंसक संघर्ष की सबसे बड़ी कीमत आम नागरिक चुका रहे हैं।
- निर्दोष नागरिकों का बलि का बकरा बनना: इस हिंसा में अक्सर निर्दोष स्थानीय लोग फंस जाते हैं, जिन्हें या तो नक्सलियों द्वारा प्रताड़ित किया जाता है या फिर सुरक्षा बलों द्वारा संदेह के आधार पर निशाना बनाया जाता है।
- सुरक्षा बलों पर मानवाधिकार हनन के आरोप: नक्सलवाद के खिलाफ कार्रवाई के नाम पर सुरक्षा बलों द्वारा मानवाधिकारों के उल्लंघन, जबरन गिरफ्तारियों, यातना और अतिरिक्त-न्यायिक हत्याओं के गंभीर आरोप लगते रहे हैं। 'सलवा जुडूम' जैसे अभियानों के दौरान ये आरोप विशेष रूप से सामने आए।
- सुरक्षा बनाम अधिकारों का द्वंद्व: राज्य की सुरक्षा सुनिश्चित करने और नागरिक अधिकारों की रक्षा के बीच संतुलन बनाना एक बड़ी चुनौती बना हुआ है, और इस द्वंद्व का खामियाजा अक्सर स्थानीय आबादी को भुगतना पड़ता है।
3. सामाजिक असमानता: आदिवासी और दलित अत्याचार
छत्तीसगढ़ के आदिवासी और दलित समुदाय सदियों पुराने सामाजिक और आर्थिक शोषण का शिकार हैं।
- सामाजिक भेदभाव एवं शोषण: इन समुदायों के साथ खुलेआम भेदभाव, छुआछूत और आर्थिक शोषण की घटनाएँ सामने आती रहती हैं।
- झूठे मामलों में फंसाना: इन समुदायों के सक्रियतावादियों और सामान्य लोगों को अक्सर झूठे आपराधिक मामलों में फंसाकर जेल भेज दिया जाता है, ताकि उनके आवाज़ को दबाया जा सके।
- न्याय तक सीमित पहुँच: गरीबी, अशिक्षा और दूरदराज के इलाकों में रहने के कारण इन लोगों की न्यायिक प्रणाली तक पहुँच बहुत सीमित है, जिससे उन्हें न्याय मिलने की संभावना कम हो जाती है।
4. आर्थिक शोषण का चक्र
राज्य की अर्थव्यवस्था का एक बड़ा हिस्सा खनन और वनोपज पर टिका है, लेकिन इसमें काम करने वाले मजदूरों और एकत्रकर्ताओं को उचित मेहनताना नहीं मिलता।
- बंधुआ एवं शोषणकारी मजदूरी: खदानों और उद्योगों में मजदूरों को उचित मजदूरी नहीं दी जाती और कई बार बंधुआ मजदूरी जैसी स्थितियाँ बनी रहती हैं। काम करने की स्थितियाँ अमानवीय और जोखिम भरी हैं।
- वनोपज का शोषण: आदिवासी समुदायों द्वारा एकत्र किए गए मूल्यवान वनोपज (जैसे तेंदूपत्ता, लाख, महुआ) को बिचौलिये बहुत कम दामों पर खरीद लेते हैं, जिससे उन्हें उनके श्रम का उचित मूल्य नहीं मिल पाता।
5. बुनियादी सुविधाओं का गंभीर अभाव
विकास के दावों के बीच, राज्य के दूरदराज के आदिवासी इलाकों में आज भी बुनियादी सुविधाओं का गंभीर अभाव है।
- स्वास्थ्य एवं शिक्षा से वंचिति: स्वास्थ्य केंद्रों में डॉक्टर और दवाइयाँ नहीं हैं, स्कूलों में शिक्षक नहीं हैं। सड़कों और बिजली की सुविधा का गंभीर अभाव है।
- कुपोषण एवं शिशु मृत्यु दर: राज्य में कुपोषण और शिशु मृत्यु दर चिंताजनक स्तर पर है, खासकर आदिवासी समुदायों में। यह स्थिति सरकारी उपेक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं के अभाव का स्पष्ट संकेत है।
निष्कर्ष: समावेशी विकास की अपरिहार्य आवश्यकता
छत्तीसगढ़ के लोगों पर हो रहे अत्याचारों और अन्याय की जड़ें गहरी आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक असमानता में हैं। संसाधनों पर नियंत्रण को लेकर चल रहा संघर्ष, सुरक्षा बनाम मानवाधिकार का द्वंद्व, और सदियों पुराना सामाजिक भेदभाव इस स्थिति के मुख्य कारण हैं।
इन जटिल चुनौतियों के समाधान के लिए एक मौलिक बदलाव की आवश्यकता है। जरूरी है कि विकास की नीतियों में स्थानीय लोगों, विशेषकर आदिवासियों के हितों, अधिकारों और आकांक्षाओं को केंद्र में रखा जाए। वन अधिकार अधिनियम जैसे कानूनों को प्रभावी ढंग से लागू करना, न्यायिक प्रक्रिया को सुदृढ़ और पारदर्शी बनाना, और सामाजिक-आर्थिक न्याय सुनिश्चित करना ही एकमात्र रास्ता है। जब तक छत्तीसगढ़ के आदिवासी और वंचित समुदायों को उनकी गरिमा और अधिकारों के साथ जीने का अवसर नहीं मिलेगा, तब तक इस 'संसाधनों के स्वर्ग' की यह कहानी विरोधाभास और संघर्ष की कहानी बनी रहेगी।
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