दुनिया का सबसे अनूठा और 75 दिनों तक चलने वाला ऐतिहासिक पर्व। इसमें रावण का वध नहीं किया जाता, बल्कि बस्तर की आराध्य देवी मां दंतेश्वरी और स्थानीय देवी-देवताओं की विधिवत आराधना की जाती है।
- 75 दिनों का अखंड पारंपारिक जन-उत्सव
- काछनगादी (कांटों के झूले पर कन्या की अनुमति) रस्म
- विशाल दो मंजिला 8 पहियों व 4 पहियों के काष्ठ रथ की परिक्रमा
- मावली परघाव (माता मावली की पालकी का भव्य स्वागत)
- मुरिया दरबार में राजा व प्रजा के बीच समस्याओं का सीधा समाधान
छत्तीसगढ़ी लोक जीवन का पहला पर्व, जो खेतों की हरियाली, कृषि औजारों और पशुधन के प्रति सम्मान व कृतज्ञता का प्रतीक है। इस दिन बांस की गेंड़ी पर चढ़ने का विशेष उत्साह रहता है।
- नांगर, गैंती, कुदाली, हंसिया आदि कृषि यंत्रों की विधिवत पूजा
- बांस की ऊंची गेंड़ी (Stilts) पर चढ़ने की अनूठी लोक परंपरा
- बैलों और गायों को औषधियुक्त लोन्दी खिलाना
- चीला, बबरा, गुलगुला और ठेठरी का पारंपरिक भोग
- घर के चौखट पर नीम की पत्तियां और भेलवा लगाना
खेती-किसानी में दिन-रात पसीना बहाने वाले बैलों और नंदी भगवान के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करने का पावन पर्व। मिट्टी के नंदिया-बैल की पूजा और बालिकाओं द्वारा पोरा-चुकिया खेलने का आनंद।
- सजे-धजे बैलों से इस दिन कोई कार्य नहीं कराया जाता
- कुम्हार द्वारा निर्मित मिट्टी के बैलों की घर-घर पूजा
- बालिकाओं द्वारा पोरा, चुकिया, जांता से गृहस्थी के खेल
- ठेठरी एवं खुरमी का विशेष पारंपरिक नैवेद्य
- बैलों की दौड़ और श्रृंगार प्रतियोगिताएं
छत्तीसगढ़ की विवाहित बेटियों का सबसे बड़ा आत्मिक और भावुक पर्व। बहन-बेटियों को ससुराल से मायके लाने भाई जाते हैं। महिलाएं अखंड सौभाग्य व पति की दीर्घायु हेतु 24 घंटे का कठोर निर्जला व्रत रखती हैं।
- करू भात (तीजा पूर्व रात्रि का कड़वा भोजन)
- 24 घंटे का अखंड निर्जला उपवास
- बालू-रेत के शिवलिंग व गौरी-गणेश का निर्माण व पूजन
- मायके में सखियों संग रात्रि जागरण, भजन व झूला झूलना
- तीजा गीत एवं पारंपरिक 16 श्रृंगार
खलिहानों से नया धान घर आने की खुशी में मनाया जाने वाला दान और समरसता का महापर्व। "छेरछेरा, माई कोठी के धान ला हेरते हेरा!" की गूंज से पूरा प्रदेश गुंजायमान रहता है।
- अन्न दान का सबसे बड़ा लोक पर्व
- युवाओं व बच्चों की टोलियां घर-घर जाकर धान मांगती हैं
- तारा गीत एवं डंडा नृत्य का सुंदर प्रदर्शन
- दूध-गुड़ का फरा, तिल के लड्डू और खीर
- अहंकार त्यागकर दान देने और लेने की परंपरा
गौरा-गौरी पूजा (शिव-पार्वती विवाह उत्सव)
भगवान शिव (गौरा) और माता पार्वती (गौरी) के अलौकिक विवाह प्रसंग पर आधारित अत्यंत पवित्र लोक अनुष्ठान। मिट्टी के गौरा-गौरी बनाकर पूरी रात जागरण, सुआ गीत और सुबह विसर्जन होता है।
- माटी कोड़ना (मिट्टी खुदाई) व गौरा-गौरी निर्माण
- रातभर मंगल विवाह गीत व ढोल-नगाड़ों की थाप
- कुश के सोंटा (चाबुक) प्रहार से कष्ट निवारण परंपरा
- नदी/तालाब में भावभीना विसर्जन जुलूस
आदिवासी अंचलों में माटी देव (धरती माता) के प्रति सम्मान व्यक्त करने का विशिष्ट पर्व। नए महुआ, फल और अन्न ग्रहण करने से पहले माटी देव को अर्पित किए जाते हैं।
- धरती मां को प्रथम मौसमी फल व अन्न अर्पण
- सामूहिक शिकार (पारध) की पारंपरिक रस्म
- भूमि को विश्राम—हल व कुदाल चलाना सख्त वर्जित
- मांदरी बाजा व लोक नृत्य का सामूहिक उल्लास
यादव (राउत) समाज द्वारा गौ-धन की सुरक्षा और भगवान कृष्ण के गोवर्धन पर्वत उठाने की स्मृति में मनाया जाने वाला वीर रस और भक्ति का त्योहार।
- खोंड देव (काष्ठ प्रतिमा) की विशेष पूजा
- दोहे (दोहावली) का ओजस्वी व वीर रस वाचन
- पारंपरिक लाठी व ढाल चालन के साहसिक करतब
- गोधन को सुहाई (पलाश व सन की माला) पहनाना
करमा नृत्य (कर्म व प्रकृति का संदेशवाहक)
बैगा, गोंड, उरांव, कंवर व बिंझवार जनजातियों का सर्वाधिक लोकप्रिय सामूहिक नृत्य। करम वृक्ष की डाल की पूजा कर "कर्म ही जीवन है" का अमर संदेश दिया जाता है।
- मांदर व टिमकी की तीव्र लयबद्ध व सम्मोहक थाप
- महिलाएं व पुरुष आमने-सामने अर्धवृत्त बनाकर नृत्य
- करमा लहकी, करमा छहा और करमा झरनी शैलियां
- प्रकृति, प्रेम, श्रम और उल्लास का अद्भुत समन्वय
पंथी नृत्य (सतनाम पंथ का आध्यात्मिक नृत्य)
बाबा गुरु घासीदास जी के सत्य, अहिंसा और मानव समरसता ("मनखे-मनखे एक समान") के सिद्धांतों को समर्पित सतनामियों का द्रुत गति का हैरतअंगेज नृत्य।
- पद्मश्री देवदास बंजारे द्वारा 60+ देशों में अंतरराष्ट्रीय ख्याति
- पिरामिड निर्माण व शारीरिक संतुलन के विस्मयकारी करतब
- मांदर व झांझ की तीव्र गति व द्रुत पद संचालन
- सफेद धोती-बंडी, साफा व घुंघरू की वेशभूषा
राउत नाचा (छत्तीसगढ़ का शौर्य एवं रास नृत्य)
यादव (राउत) समाज द्वारा पारंपरिक वेशभूषा, मोरपंख की पगड़ी और हाथों में सजी लाठियां लेकर किया जाने वाला छत्तीसगढ़ का सर्वाधिक ओजस्वी और रंगारंग लोक नृत्य।
- बिलासपुर का ऐतिहासिक राष्ट्रीय राउत नाचा महोत्सव (1978 से निरंतर)
- शौर्य, वीरता, दोहा वाचन और लाठी चालन कला
- कौड़ियों व गोटा से जड़ी रंग-बिरंगी पोशाक व मोरपंख मुकुट
- गुदुम, नगाड़ा, मोहरी और डफली की कर्णप्रिय धुन
महिलाओं और कन्याओं का कोमल व मर्मस्पर्शी लोक नृत्य। धान से भरी टोकरी में मिट्टी का सुआ (तोता) रखकर वृत्ताकार घेरे में ताली की थाप पर शिव-पार्वती के गीत गाए जाते हैं।
- बिना किसी वाद्ययंत्र के सिर्फ तालियों की थाप पर नृत्य
- मिट्टी का तोता भगवान तक संदेश पहुंचाने का माध्यम
- विरह, भक्ति, दांपत्य और पारिवारिक संवेदनाएं
- पारंपरिक लाल-पीली साड़ियां और आभूषण
पंडवानी (महाभारत की ओजस्वी लोक गाथा)
महाभारत की कथाओं को छत्तीसगढ़ी बोली में अत्यंत ओजस्वी, नाटकीय और संगीतमय शैली में प्रस्तुत करने की विश्वविख्यात लोक कला। तंबूरा और करताल का अद्वितीय प्रयोग।
- कापालिक शैली (खड़े होकर अभिनय युक्त - पद्म विभूषण डॉ. तीजन बाई)
- वेदमती शैली (बैठकर शास्त्रसम्मत - झाडूराम देवांगन, पुनाराम निषाद)
- तंबूरे को गदा, धनुष, रथ और तलवार बनाने का अद्भुत अभिनय
- दुनिया के 50+ देशों में भारत की पहचान
गौर नृत्य / गौर-माड़िया नृत्य
दण्डामी माड़िया आदिवासियों का विश्वप्रसिद्ध वीर नृत्य। पुरुष सिर पर गौर (जंगली भैंसा) के सींगों और कौड़ियों का भारी मुकुट धारण कर विशाल ढोल बजाते हैं।
- जंगली भैंसे के सींगों व कौड़ियों का अलंकृत मुकुट
- पुरुषों के गले में 3-4 फीट लंबा विशाल ढोल
- महिलाएं लोहे की छड़ (टिडिंग) से जमीन पर ताल देती हैं
- प्रसिद्ध मानवविज्ञानी वेरियर एल्विन द्वारा सर्वोच्च प्रशंसा
ढोकरा / बेल मेटल शिल्प (हड़प्पा कालीन लॉस्ट-वैक्स कला)
4000 वर्ष पुरानी सिंधु घाटी सभ्यता की लॉस्ट वैक्स (खोई मोम) तकनीक से कांस्य और पीतल की अद्वितीय कलाकृतियों का निर्माण। घड़वा शिल्पकार इसमें सिद्धहस्त हैं।
- भौगोलिक उपदर्शन (GI Tag) प्राप्त शिल्प
- मधुमक्खी के मोम के बारीक धागों से सांचे का निर्माण
- प्रत्येक कलाकृति अद्वितीय (एक सांचे से केवल एक पीस)
- विदेशों में अत्यधिक मांग और वैश्विक कला दीर्घाओं में प्रदर्शन
अगरिया व लोहार जनजाति द्वारा बेकार पड़े लोहे को भट्ठी में लाल-गर्म कर हथौड़ों से पीट-पीटकर बनाई जाने वाली अद्भुत आकृतियां, दीप स्तंभ और जनजातीय आभूषण।
- GI Tag प्राप्त शिल्प
- बिना वेल्डिंग के केवल पीट-पीटकर जोड़ना
- दीया, हिरण, पेड़, सैनिक और जनजातीय जीवन की आकृतियां
- पर्यावरण हितैषी रीसाइकिल्ड लोहा और आधुनिक इंटीरियर में मांग
शहतूत व अर्जुन वृक्षों पर पलने वाले कोकून (रेशम कीट) से काता जाने वाला प्राकृतिक तसर रेशम। जांजगीर-चांपा के देवांगन बुनकरों की पीढ़ियों पुरानी कला।
- प्राकृतिक सुनहरी चमक, टिकाऊपन व दीर्घायु
- गर्मियों में ठंडा और सर्दियों में गर्म रहने का गुण
- शुद्ध प्राकृतिक व ऑर्गेनिक धागे से निर्मित
- चांपा की कोसा साड़ियों का विदेशों में निर्यात
आदिवासी महिलाओं के शरीर पर स्थायी रेखाओं व प्रतीकों को गोदने की प्राचीन परंपरा, जिसे अब कलाकारों ने सूती वस्त्रों, साड़ियों और कैनवास पेंटिंग पर अमर कर दिया है।
- काजल व वनस्पति अर्क के प्राकृतिक रंगों का प्रयोग
- ज्यामितीय आकृतियां, मोर, पेड़ और प्रकृति प्रतीक
- शांतिबाई जैसी लोक कलाकारों द्वारा राष्ट्रीय पुरस्कार
- साड़ियों और दुपट्टों पर आधुनिक फैशन ट्रेंड
राजिम कुंभ कल्प (त्रिवेणी संगम का महाकुंभ)
महानदी, पैरी और सोंढूर नदियों के पवित्र त्रिवेणी संगम पर 15 दिनों तक चलने वाला मध्य भारत का सबसे विशाल धार्मिक व सांस्कृतिक समागम। इसे छत्तीसगढ़ का प्रयाग कहा जाता है।
- त्रिवेणी संगम पर तीन शाही स्नान (माघ पूर्णिमा, जानकी जयंती, महाशिवरात्रि)
- देशभर के प्रख्यात साधु-संतों और नागा अखाड़ों का समागम
- भगवान श्री राजीव लोचन एवं कुलेश्वर महादेव का दर्शन
- भव्य गंगा आरती, लेजर शो और राष्ट्रीय सांस्कृतिक संध्याएं
बस्तर मड़ई मेला (आदिवासी देव मिलन उत्सव)
बस्तर अंचल का सर्वाधिक रंगारंग और पारंपरिक मेला। दर्जनों गांवों के ग्रामीण अपने-अपने देवी-देवताओं के आंगा, छत्र और लाट लेकर एक स्थान पर एकत्र होते हैं।
- नारायणपुर की ऐतिहासिक मड़ई (सबसे बड़ी मड़ई)
- काष्ठ निर्मित आंगा देवों की परिक्रमा व मिलन
- पारंपरिक आदिवासी हाट, धनुष-बाण व औजारों की बिक्री
- मांदरी, गौर नृत्य और रातभर चलने वाले लोक उत्सव
चक्रधर समारोह रायगढ़ (शास्त्रीय संगीत व कत्थक महाकुंभ)
संगीत सम्राट महाराजा चक्रधर सिंह की स्मृति में प्रतिवर्ष आयोजित होने वाला देश का शीर्षस्थ शास्त्रीय संगीत, तबला वादन और कत्थक नृत्य समारोह।
- कत्थक के "रायगढ़ घराना" का गौरवशाली मंचन
- पद्मश्री, पद्म विभूषण प्राप्त राष्ट्रीय कलाकारों की प्रस्तुतियां
- तबला, सितार, सरोद, संतूर और शास्त्रीय गायन
- 10 दिनों तक चलने वाली कला व संगीत की अविरल धारा
संत शिरोमणि बाबा गुरु घासीदास जी की पावन जन्मभूमि और तपोभूमि गिरौदपुरी में आयोजित होने वाला तीन दिवसीय विशाल मेला। 77 मीटर ऊंचा देश का सबसे बड़ा जैतखाम आकर्षण का केंद्र है।
- 77 मीटर (243 फीट) ऊंचा विश्वप्रसिद्ध जैतखाम (कुतुबमीनार से भी ऊंचा)
- छाता पहाड़, औरा-धौरा वृक्ष व अमृतकुंड तपोभूमि दर्शन
- लाखों श्वेत वस्त्रधारी सतनामियों का पावन संगम
- अखंड पंथी नृत्य, गुरुवाणी गायन एवं विचार गोष्ठी
मांदर (माटी का ढोल - लोक नृत्यों की आत्मा)
पकी हुई मिट्टी के बेलनाकार ढांचे पर चमड़ा मढ़कर बनाया जाने वाला वाद्ययंत्र। करमा, पंथी और सरहुल नृत्य मांदर की थाप के बिना संभव ही नहीं हैं।
- पकी मिट्टी के ढांचे की विशिष्ट भारी व गूंजदार ध्वनि
- दोनों सिरों पर अलग-अलग ताल वादन की तकनीक
- गले में लाल फीता डालकर नर्तक स्वयं बजाते हुए नाचते हैं
- आदिवासी संस्कृति और उत्सवों की धड़कन
धनकुल (मटका, सूप और धनुष से बना अद्वितीय वाद्य)
मिट्टी के घड़े (मटका), बांस के सूप और धनुष की डोरी को मिलाकर बजाया जाने वाला बस्तर का अनूठा वाद्य। यह केवल वाद्य नहीं बल्कि देवी जागृति का अनुष्ठानिक साधन है।
- घड़ा, सूप और धनुष की अद्भुत यांत्रिक जुगलबंदी
- केवल महिलाओं (गुरूमाय) द्वारा अनुष्ठानिक वादन
- आठ-आठ दिनों तक चलने वाले संगीतमय धनकुल गीत
- तीजा जगार, लक्ष्मी जगार व बाली जगार की गाथाएं
कोई सांस्कृतिक परिणाम नहीं मिला
कृपया अन्य शब्द से खोजें (उदा. दशहरा, हरेली, पोला, पंथी, करमा, शिल्प)।